Wednesday, 7 May 2014

तिवारी 'बाबा'

शिवानंद तिवारी 
आजकल शिवानंद तिवारी कह रहे कि मोदी ओछी राजनीति कर रहे हैं। पता नहीं शिवानंद तिवारी पूरी जिंदगी कौन सा राजनीति किये हैं ? किसके बारे में बात करे ? जब तक राजद में थे तब तक क्या किये थे ? उसके बाद जदयू में आने के बाद क्या किया ? तब - तक हमारे साथ थे। आज हम से अलग हो गये तो हम ओछी राजनीति करने लगे है। तिवारी बाबा जो राजनीति आप कर रहे हैं उसका सज़ा आपको आप के पार्टी दे दिया है। जिस लोग जो भी कुछ किया था  आज वे लोग भी आपके साथ नहीं है। अच्छा है सही रास्ता चुना है।


Friday, 2 May 2014

केजरीवालजी को वोट देना देश से गद्दारी होगा?

केजरीवालजी का अमेठी की एक जनसभा में बिना किसी आधार के यह कहना क़ि 'भाजपा को वोट देना देश से गद्दारी है' और कुछ नही उनके मानसिक दिवालिएपन को ही उजागर करता है. इसके बरअक्स अगर आम आदमी पार्टी की कारगुजारियों को देखा जाये तो स्पष्ट होगा की भाजपा नही बल्कि आम आदमी पार्टी को वोट देना देश से गद्दारी होगा. आप लोगो को याद होगा इस पार्टी के नेता श्री प्रशांत भूषण का वह बयान जिसमे उन्होने कश्मीर में जनमत संग्रह करवाने की मांग का समर्थन करा था और उनका यह बयान इस पार्टी के देश प्रेम की पोल खोलने के लिये काफी है क्योकि कश्मीर में जनमत संग्रह करवाने का राग जब तब पाकिस्तान और उसके इशारे पर नाचने वाले अलगाववादी नेता ही अलापते है. इतना ही नही जो केजरीवालजी दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती दीक्षित के खिलाफ 300 पन्नो के सबूत होने का दावा करते नही थकते थे, वही केजरीवालजी कांग्रेस के आशीर्वाद से सत्तासीन होते ही सब कुछ भूल गये. आखिर सबूत होते हुए भी ऐसी क्या मजबूरी थी जो केजरीवालजी, श्रीमती दीक्षित के खिलाफ जांच करवाने की हिम्मत नही जुटा पाये? इसका जबाब तो केजरीवालजी ही दे सकते है लेकिन इतना तो स्पष्ट है की या तो केजरीवालजी ने सबूत होने का झूठ बोला था और या फिर वह भ्रष्टाचार के साथ है. उपरोक्त बानगी से अब आप स्वयं फ़ैसला कीजिये कि एक ऐसी पार्टी जिसकी कश्मीर नीति पाक परस्त हो और जिसके नेता या तो जनता से झूठ बोलते हो और या भ्रस्टाचार के समर्थक हो को वोट देना क्या देश से गद्दारी नही होगा?

Thursday, 24 April 2014

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए।
आपको चेहरे से भी  बीमार  होना चाहिए।
अपनी यादों से कहो कि एक दिन कि छुट्टी दे हमें ,
इश्क़  के  हिस्से में   भी  इतवार   होना     चाहिए।
----मुनव्वर राणा 
किसी के हिस्से में दुकाँ आई है ,
मैं घर मेँ सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई है। 

Sunday, 30 March 2014

"मौनी बाबा"

त्यागी जी आजकल चैनल दर -दर बीजेपी तानाशाह बोल रहें हैं। बीजेपी बड़े लोगों का सम्मान नहीं करती है। मोदी तानाशाह हैं। बीजेपी में मोदी के अलावा किसी का नहीं चलता है। बीजेपी में पुराने कार्यकर्ता का कोई सम्मान नहीं होता। बीजेपी उदार पर लिये गए लोगो को टिकट दिया है। बीजेपी को लोकतंत्र ख़त्म हो गया। आप  ने तो यहाँ तक कह दिया कि जिस तरह इंदिरा गांधी ने कांग्रेस का हल किया था उसी पर कर आज बीजेपी का है।  पता नहीं और भी कितने आरोप लगते हैं। पर आप कभी नहीं अपने गिरे वान में झाक कर देखा। आपके पार्टी जदयू में जो हुआ और जो हो रहा है क्या इन सब सवाल का जवाब आपके पार्टी वाले दे सकते हैं? जदयू में कौन नहीं जनता है कि सारा कम नितीश कुमार के इशारे पर होता है ? आपके नितीश कुमार तानाशाह नहीं हैं ? क्या उनके मर्ज़ी के खिलाफ शरद यादव एक पत्ती भी हिला सकते हैं ? जहाँ तक बड़े कि सम्मान कि बात है नितीश कुमार और जदयू ने जार्ज फर्नाडीस को किस सम्मान से टिकट कट दिए थे ? सिर्फ फर्नाडीस साहब कि बात नहीं है। शिवानंद तिवारी "बाबा " का टिकट क्यों कट दिया ? एक नेता को पार्टी फोरम पर बोलने का अधिकार नहीं है ? यह तानाशाही आप को नजर नहीं आया ? 2010 के विधानसभा चुनाव में आपके सांसद (राजीव रंजन सिंह उर्फ़ लालन सिंह ? खुले आम कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर रहे थे उस समय उनको कोई पार्टी से नहीं निकला। क्यों ?वे नितीश के खास आदमी थे ? चार राज्यसभा के  सांसद का टिकट कट दिए क्यों कि वो नितीश खेमे के नहीं थे। क्या दोष था एन के सिंह का ? कितना बड़े का सम्मान किये क्यों जय नारायण निषाद  को 90 वर्ष में पार्टी से निकल दिए गए हैं ? जदयू में नितीश के अलावा किसी का चलता है ? जदयू में कैसा लोकतंत्र है ? कार्यकर्ता पार्टी पर कुछ नहीं बोल सकते। अगर बोल दिए तो पार्टी बहार का रास्ता दिखा देती है। कहाँ गया जार्ज फर्नाडीस युग  ? 12 लोकसभा के  सांसद में आप कितने को टिकट दिए हैं ? आप ने भी तो आधे से अधिक उधर के लोगो को टिकट दिया है। दूसरे का घर फोरने में तो मजा आया था ? आप के सुशासन बाबू कहते हैं कि बीजेपी मुस्लिम का सम्मन नहीं करती है ! एक बार मुख़्तार अब्बास नक़वी कहने पर बीजेपी साबिर अली को पार्टी से निकल दिया। त्यागी जी दिन भर टीवी चैनलों पर कहते फिरते हैं कि हम गैर कॉंग्रेस्सवाद विरोध करते हैं। दूसरी तरफ आप कि पार्टी कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रही है। आप में और आम आदमी पार्टी में कितना फर्क रह गया है ? टोपी और टीका लगाने वाले सुशासन बाबू क्यों बोल रहे हैं कि मुस्लिम नेता क्यों जदयू एक के बाद एक छोर रहे हैं ? 17 साल से बीजेपी 

सांप्रदायिक नहीं था।  गठबंधन से हटते ही सांप्रदायिक हो गया ? आज आप कि पार्टी सपा के साथ थर्ड फ्रंट

बना ये हैं।  सपा सांप्रदायिक नहीं है ? देश के सर्वोच्च न्यायलय  ने सपा सरकार को दोषी माना है। इस पर तो 

आपका एक भी बयान नहीं आया है ? आप और आप कि पार्टी तथा सुशासन बाबू किस प्रकार के राजनीति 
करते हैं पता नहीं ? दूसरे के घर जलाना ,फोरना दूसरे पर किचर उछाल ना दूसरे के प्रगति पर जलना ये सब तो नहीं लगता है जार्ज फर्नाडीस का पार्टी है। अब आप से क्या कहूँ आप और आप के लोग नीच किस्म की राजनीति पर उतर आये हैं। 













Thursday, 27 February 2014

हवा का रुख !

लोग बड़ा परेशान हैं 12 साल बाद पासवान राजग में आ गए हैं। इसको किस नजर से देखे ? नीतिश या लालू के नजर से देखे ?नीतिश के नजर से देखने वालो को लग रहा है कि कुछ मिलते -मिलते रह गया। बहुत आशा थी पासवान से पर कुछ मिला नहीं। चार महीने कि कोशिश बीजेपी मार ले गया। लालू जी के नजर से देखने वालो को समझ नहीं आ रहा है कि हमें फायदे है या नुक़सान ? पर जो पासवान पिछले चुनाव में 5 से 6 % वोट ला ये थे उसका क्या ?जाहिर है  पासवान जी का बिहार के जातिगत राजनीति कुछ तो प्रभाव है। अब तो पता नहीं कांग्रेस को  क्या लग रहा है कि मेरे सहारे लालू जी हैं या मैं  लालू जी के सहारे बिहार कि राजनीति में। खुश कौन है ? बड़े पासवान , छोटे पासवान या दोनों ? बड़े वाले तो होंगें कि जो भी सीट हमने माँग कि वो तो मिल गया नहीं तो लालू जी 2 से ज्यादा तो देते नहीं। जहाँ तक बेटे कि बात है वो भी सक्रिय राजनीति में हवा के साथ जीत जाएगा। सब मिला कर पासवान को तो लाभ ही लाभ है। उसके बदले में नरेंद्र मोदी को क्लीन चीट  दे दिया। उसी मोदी को लेकर 12 साल पहले छोड़ कर चले गये थे। क्यों नहीं देते क्लीन चीट जहाँ बेटा और पार्टी दोनों दाऊ पर लगा हुआ था। इन सरे चीजों में सब से ज्यादा लाभ बीजेपी को हुआ है। जहाँ 13% दलित है उस से उम्मीद को कुछ कि ही जा सकती है। 

Wednesday, 12 February 2014

संवेदनाओं के पंख: खूब अवसर

इश्क़ का महीना बस फ़रवरी है, नाकाम आशिक़ों को हड़बड़ी है ।
सलीक़ा ही आता तो तरीक़ा करता, इश्क़ में ग़ालिब इक़बाल न पढ़ता ।

हम क्यों मनाते हैं वेलेंटाइन? हमारा इससे क्या वास्ता? हमें इससे क्या लेना-देना? न तो यह हमारी संस्कृति में है और न ही हमारे देश में कभी इस दिवस का प्रचलन था। फिर क्यों कर हम इसे मनाएँ।

ज्यादातर मौकों के रूप में वे वेलेंटाइन दिवस के कैथोलिक चर्च में जन्म लिया है. दिन भी वैलेंटाइन्स दिवस कहा जाता है. वेलेंटाइन एक कैथोलिक संत है. वैलेन्टिन बारे में कई मिथकों हैं, लेकिन एक अधिक प्रसिद्ध है: वेलेंटाइन एक ईसाई पुजारी, जो 200 में रोम में रहते थे. वह एक साधु और इटली में बिशप टर्नी था. तो यह Interamne बुलाया गया था. वह बगीचे में फूलों को लेने और उन्हें युवा प्रेमियों के लिए देने के लिए इस्तेमाल किया. यही कारण है कि वे आम तौर पर इस दिन पर एक दूसरे को फूल दे. इस समय में सम्राट क्लोडिअस द्वितीय के एक कानून था, युवा जोड़े शादी करने के लिए नहीं था. प्रतिबंध लगाने के लिए कारण था क्योंकि क्लोडिअस द्वितीय अपनी सेना में अविवाहित सैनिकों चाहता था. उन्होंने कहा कि वे अपनी पत्नियों, गर्लफ्रेंड, और परिवारों को छोड़ कई खूनी लड़ाई में भाग लेने के लिए नहीं करना चाहता था. इस प्रतिबंध वैलेन्टिन ललकारा और युवा जोड़ों के लिए कई शादियों officiated. इसलिए, वह कैद किया गया था और सम्राट माक्र्स Aurelius ने मौत की सजा सुनाई. जब वेलेंटाइन जेल में था कि वह जो उसे दिया फूल या छोड़ने के छोटे संदेश मुझे बताया कि वे सोचा कि वह सही काम किया था, और वे भी प्यार में विश्वास है कि कई युवा लोगों ने दौरा किया था उसके निष्पादन का इंतजार. 


फिर भी हम इसे मनाते हैं। हम भारतवासी हैं। हमने दुनिया को प्यार करना सिखाया है। इसलिए दुनिया में अगर प्रेम के लिए कोई दिवस मनाया जाता है तो हम क्यों इसे ठुकराएँ। हमने तो हमेशा सबका आदर किया है। ‍इतिहास गवाह है कि भारतवासियों ने अपने दिल में सदा से ही हर उस सभ्यता को अपनाया है जो प्रेम, अहिंसा का संदेश देती है। हमारे देश में विश्व के सभी प्रमुख त्योहार मनाए जाते हैं। 

हम हिन्दुस्तानी ‍मंदिर के सामने से निकलें या मस्जिद के या किसी चर्च के, श्रद्धा से अपना शीश झुकाते ही हैं। कोई संत हो या फकीर या फादर, हम उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं। हमारे पूर्वजों ने दूसरों का आदर करना हमें सिखाया है। हम दूसरों की संस्कृति को बहुत जल्द आत्मसात कर लेते हैं। यह हमारे स्वभाव में है। हमारा सोच हमेशा सकारात्मक रहा है। हम भारत ही नहीं दुनिया के सारे देशों का आदर करते हैं। 

तो फिर क्यों न हम वेलेंटाइन डे भी मनाएँ। मनाएँगे और जरूर मनाएँगे। लेकिन आज के कथित संकीर्ण सोच वाले युवाओं ने इसे विकृत बना दिया है। जिस प्रकार से 31‍िदसंबर को कहीं-कहीं असभ्य और अशालीन तरीके से मनाया जाता है ठीक उसी प्रकार वेलेंटाइन डे को कुछ लोगों ने बना दिया है।
पिछले वर्ष की बात है एक लड़की को 14 फरवरी की सुबह एक गिफ्ट मिलता है जिसमें किसी का नाम नहीं होता। वह कुछ अजीब सा रहता है। वह उसे एक तरफ रख देती है। लेकिन शाम को वह गिफ्ट पहुँचाने वाला उसके घर पहुँच जाता है और लड़की को अपने साथ चलने के लिए कहता है। जब वह मना करती है तो वह उससे कहता है कि आज वेलेंटाइन डे है और तुमने मेरा गिफ्ट स्वीकार किया है। 

इसलिए तुम्हे मेरे साथ चलना ही होगा। यह असभ्य तरीका ठीक नहीं है। वह लड़की तो समझदारी से संभल जाती है लेकिन अनेक युवा-युवतियाँ इस प्रणय निवेदन को अपनाकर कुछ ऐसे कदम उठा लेते हैं जिसके बाद में पछतावे के सिवा कुछ नहीं रह जाता।

होना तो यह चाहिए कि इस वेलेंटाइन डे की तमाम अच्छाइयों को हम अपनी संस्कृति में मिलाएँ और‍ फिर इसे मनाएँ तब देखिए जिंदगी कितनी खुशहाल लगने लगेगी। हमारी संस्कृति में लड़का-लड़की अगर माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध शादी करते हैं तो लोग यही कहते हैं कि लड़की भाग गई। उसका यूँ जाना ऐसा लगता है मानो उसने अनर्थ किया हो। जबकि सच यही है कि उसने अनर्थ किया है। 

माता-पिता जिन्होंने 20-25 साल उसे प्यार किया वे उसे अपने नहीं लगते ‍उसके आगे जो मात्र कुछ दिनों से उसे चाहता है। आधी उम्र माता-पिता के साथ गुजारने के बाद बची आधी उम्र माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध गुजारना क्या उनके साथ न्याय है। क्या उनकी इच्छा, अपेक्षा और समाज में उनके हैसियत के साथ खिलवाड़ करना उनके सम्मान को अपमानित करने जैसा नहीं है। 

आज मीडिया कुछ कंपनियों के उत्पाद बेचने, उनकी पब्लिसिटी के लिए युवा को प्रणय निवेदन करने के तरह-तरह के प्रलोभन देता है। टिप्स बताता है। मोबाइल कंपनियाँ अपना कारोबार करने के लिए तरह-तरह की आकर्षक योजनाएँ चलाती हैं। अनेक प्रकार के आर्टिकल्स और लुभावने उदाहरण देकर युवा वर्ग को आकर्षित करते हैं। युवा इनसे भ्रमित हो जाते हैं। इनमें लिखे प्रेमी-प्रेमियों के किस्से इन्हें अपने लगने लगते हैं। वि‍भिन्न चैनल भी अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रायोजित करते हैं। केवल अपनी दुकान चलाने के लिए ये सब समाज का कितना नुकसान करते हैं यह तो केवल समझने वाला ही समझ सकता है।